HomeHEALTH EDUCATIONimmunity and chemotherapy, in hindi (संक्रमण,असंक्राम्यता और कीमोथेरेपी)

immunity and chemotherapy, in hindi (संक्रमण,असंक्राम्यता और कीमोथेरेपी)

संक्रमण  (infections)

कई प्रकार के जीवित जीवाणु मानव शरीर में प्रवेश करके बहुत नुकसान पंहुचा सकते है। :immunity and chemotherapy

( 1 ) बैक्टीरिया (bacteria) : 

ये एक बहुत ही छोटी छोटी कोशिकिय जीवाणु होते है। जिन्हे माइक्रोस्कोप द्वारा देखा जा सकता है ये हर जगह पाया जाता है जैसे – हमारे आस पास की वायु में ,ज़मीन पर ,हमारे कई तरह के चीज़ो पर और यहाँ तक की हमारे भोजन पर भी पाए जाते है। ये हमारे त्वचा पर ,हाथो पर मुँह और हमारे ऑतो में भी होता है।
 ऐसा नहीं है की ये सभी हानिकारक या बीमारी पैदा करने वाले होते है।(pathogenic) ज़्यादा तर जीवाणु कोई भी बीमारी पैदा नहीं करते। अधिकांश बैक्टीरिया अरोगात्मक और वास्तव में लाभकारी होते है। हमारे आँतो में सामान्य रूप से होने वाले बैक्टीरिया रोगात्मक जीवाणुओं की वृद्धि को रोकते है और विटामिन्स के निर्माण में भी सहायक होते है।

( 2 )  वाइरस (viruses) :

वाइरस इतने छोटे होते है की इन्हे साधारण माइक्रोस्कोप से नहीं देख सकते।
ये सिर्फ जीवित कोशिकाओं में जीवित रह सकते है। क्युकी ये खुद जीवित रहने के लिए हमारे कोशिकाओं के पोषक तत्वों पर पूरी तरह से निर्भर होते है। ये वाइरस एंटीबायोटिक्स की प्रतिक्रिया के लिए प्रतिरोधी होते है।

( 3 )  फॉन्जी (fungi) :

  इनको माइकोसीस  (mycoses) भी कहा जाता है. कई प्रकार के फॉन्जी या मौल्डस ज़मीन, पर और सडे – गले पदार्थो और पक्षियो की मल -वस्तुओ में पाया जाता है।
फॉन्जी को वनस्पति के रूप में मन जाता है और ये कभी कभी बैक्टीरिया के कार्यो को भी रोकने में सहायता करती है।
जैसे – पेनिसिलिन दवाई इस प्रकार की मौल्डस से मिलती है। अन्य फॉन्जी ,जिन्हे माइकोसीस कहते है त्वचा को व मुँह को और फुप्फुसो को संक्रमित करती है।

( 4 )  प्रोटोजोआ (protozoa) :

ये बैक्टीरिया से कुछ बड़े कोशिका जीव होती है जो अपने जीवन के समय बदलते रहते है। प्रोटोजोआ से फैलने वाली दो बीमारिया व्यापक रूप से फैलती है – मलेरिया और अमीबिक पेचिश।

( 5 ) मेटाजोआ (merazoa) :

ये बहुकोशिकाये जीवाणु होते है जिनको हम बिना माइक्रोस्कोप की सहायता से देख सकते है। इनके अंदर विभिन्न प्रकार के परजीवी  जैसे -जू ,स्केबीज ,रोगाणु, व आँतो के कृमि सम्मिलित है।

बैक्टीरिया (bacteria) immunity and chemotherapy

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कई प्रकार के बैक्टीरिआ की संख्या बहुत ज़्यादा हो सकती है।  कुछ अन्यो की अपेक्षा गंभीरता और बीमारी पैदा करने में अधिक मह्त्वपूर्ण होते है। हम आपको यहाँ पर सिर्फ अधिक सामन्य व महत्वपूर्ण बैक्टीरिआ के बारे में ही वर्णन करेंगे।  बैक्टीरिआ विभिन्न समूहों में विभाजित किया जाता है। जिन्हे कोकई बेसिलाइ और स्पाइरॉकिट्स कहा जाता है।

कोकाई  (cocai) -immunity and chemotherapy

ये जीवाणु गोलाकार होते है। और जब ये बहुत अधिक बढ़ने लगते है तो अपने प्रकार के अनुसार विभिन्न समूहों में विभाजित होता है। जब ये एक साथ या समूहों में बढ़ते है तब इन्हे स्टेफिलोकोकई (staphylococi) कहा जाता है।  अगर ये जोड़ो में बढ़ने लगते है तो इन्हे डिप्लोकोकई (diplococi)  कहते है।
इन मुख्य समूहों को विभिन्न पहलुओं के भागो में विभाजित किया जाता है।  जैसे – कुछ बहुत ज़रूरी स्ट्रेप्टोकोकाई को जब हम रक्तयुक्त विशिष्ट मीडिअम में विकसित करते है।
तब ये लाल रक्तणुओ को ख़तम कर देता है। या हम ये भी कह सकते है की रक्त हिमोलाइज हो गया है। इसलिए इन्हे  ‘हिमोलिटिक स्ट्रेप्टोकोकाई कहते है। ताकि स्ट्रेप्टोकोकई के दूसरे प्रकारो ,जो रक्त में होने वाले विकसित हिमोलाइसिस नहीं करते है ,बस इसका अंतर ज्ञात किया जाता है।
ऐसे बहुत से कोकाई है जिनको उनके द्वारा शरीर में हो जाने वाली बीमारी के नाम से जाना जाता है। फुप्फुसो की सामान्य बीमारी ,जैसे की न्यूमोनिया कहा जाता है।
ये तब होता है जब बहुत सारे कोकाई  एक दूसरे  के संपर्क में आते है जिन्हे , न्यूमोकोकाई (pneumococi) का नाम दिया गया है। कुछ कोकाई  और बेसिलाई बीमारी पैदा करने के साथ – साथ पिप का निर्माड भी करते है और इसलिए इन्हे पीपजनक जीवाणु (pyogenic Organisms) के सामान रखा गया है।
इनमे से कई कोकाई है – स्टेफिलोकोकाई, स्ट्रेप्टोकोकाई, न्यूमोकोकाई, मेनिन्गोकोकाई और कार्लिफार्म (coliform bacilli) होते है।

बेसिलाई (Bacilli)

बेसिलाई ,गोलाकार के रूप के बजाय छड़ के आकर के होते है। और जो भी ये बीमारी पैदा करता है उसी के अनुसार इसका नाम दिया जाता है।

स्पाइरॉकिट्स (spirochaetes) immunity and chemotherapy

बैक्टीरिआ का अंतिम बहुत ही महत्वपूर्ण समूह ,स्पाइरॉकिटल समूह होता है।  ये कोई भी जीवाणु कोकाई या बेसिलाई के बदले बहुत बड़े होते है। और इनका आकार ( शरीर ) कई मोड़ो  (curves) का होता है। जो पहले वाले कोकाई थे उनके अपेक्षा कम बीमारिया होती है. हम इंसानो में स्पाइरोकीट्स के कारण ज़्यादा अधिक महत्वपूर्ण बीमारिया होती है।

 

वाइरससे  (viruses) 

immunity and chemotherapy
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➤ विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया  -immunity and chemotherapy

वाइरस कुछ अधिक रूप से फैलने वाले बीमारिया, जैसे इन्फ्लुएंजा और  सामान्य तौर पर होने वाली सर्दी जुखाम के लिए जिम्मेदार होते है। कई बहुत अधिक बुखार भी वाइरस के कारण होते है। जब बहुत अधिक गंभीर वाइरस संक्रमणों के अंतर्गत आते है तो पोलिओमैलाइटिस ,एनकेकेलाइटिस और वाइरल न्युमोनिआ होता है
 बैक्टीरिआ से होने वाले कारणों में संक्रमणों के विपरीत वाइरल संक्रमण एन्टीबायोटिक्स या सल्फोनामाइड्स दवाइयों से प्रभावित नहीं होता है। इसलिए ऐसे वाइरस से पैदा होने वाली कई भीमारी को ख़तम करने का कोई सटीक या प्रभावकारी उपचार नहीं है।
 परन्तु हमारे लिए ये अच्छी बात है की ज़्यादा तर वाइरल संक्रमण हमारे शरीर के असंक्रमयता प्रणली (immunity system) वाइरस को पूरी तरह ख़तम कर देती है
और हमे कई जान लेवा बीमारियों के खतरों से भी बचाती है। पर कभी कभी वाइरस के बहुत ज़्यादा गंभीर प्रकार से अनियत्रित या काफी फैलने वाले हो जाते है। जैसे की सन 1918 में इन्फ्लुएंजा की महामारी की समय हुवा था। तब कई हजारो की संख्या में लोगो की मृत्यु हुई थी।

AIDS(Acquired Immunodeficiency syndrome) का पता सबसे पहले अमेरिका में सन 1981 में चला था। यह बीमारी (Human immune deficiency virus ( HIV ) द्वारा फलती है।

इस वाइरस को सन 1983 में पूरी तरह से पहचाना गया। वाइरस ,लिम्फोसाइट्स पर आक्रमण करता है। जो की हमारे शरीर पर संक्रमण से सुरक्षा करता है। ये वाइरस समलैंगिक ,इंजेक्टिंग ड्रग लेने से या हिमोफिलिएक्स को अधिक प्रभावित करते है।
AIDS का कोई इलाज अब तक नहीं बन सका है। इस वाइरस से सभी देश जुज रहे है पर ये वायरस जिस इंसान को है उसके अलावा और किसी दूसरे इंसान को कोई नुकसान या प्रभावीत नहीं करता है।
ज़्यादा तर वाइरल बीमारियो के बारे में उनके विशिष्ट चिन्हो और लक्षणों को देख कर ही पता लगाया जा सकता है।  बैक्टीरिअल संक्रमणों में रक्त सफ़ेद रक्तणुओ की संख्या बहुत ही बढ़ जाती है।

(ल्यूकोसाइटोसिस)

के प्रकार के कारण से होने वाले संक्रमणों  में यह संख्या नहीं बढ़ती है ,और इस वाइरस के संक्रमण की पुष्टि करना बहुत ही कठिन होता है।
और इनके निदान में बैक्टीरिअल संक्रमणों से अधिक समय लगता है कई  पदार्थो में होने वाले वाइरस के संवर्दन (culture) के अच्छी तकनीक की आवश्यकता पड़ती है। रक्त में होने वाले वाइरस एंटीबॉडीज की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। लेकिन इन सब जाँच की प्रक्रिया में बहुत समय या कई सप्ताह भी लग जाते है।
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